माँ, मैं जानता नहीं, समझता नहीं,
पर सब कुछ महसूस करता हूँ,
माँ, मैं रोकता नहीं, टोकता नहीं,
पर सब कुछ कहना चाहता हूँ।
पंखे जब तेज़, गोल गोल घुमते हैं,
मन मचलता और मैं झूमता हूँ।
कैलेंडर, परदे जब झोंकों से हिलते हैं,
मन तृप्त होता और मैं भ्रह्मित होता हूँ।
मेरे पेट मैं जब चूहे-बिल्ली दौड़ते हैं,
मैं भी टकटकी लगाये, बाट जोहता हूँ,
मैं हिल सकता नहीं, सरक पाता नहीं,
कई बार अपने ही मलमूत्र में सोता हूँ,
पर इंतज़ार के जब कई बाँध टूटते हैं,
तब जाकर मैं बिलखते हुए रोता हूँ।
माँ, मैं तब जाकर बिलखते हुए रोता हूँ। ----- शशि
पर सब कुछ महसूस करता हूँ,
माँ, मैं रोकता नहीं, टोकता नहीं,
पर सब कुछ कहना चाहता हूँ।
पंखे जब तेज़, गोल गोल घुमते हैं,
मन मचलता और मैं झूमता हूँ।
कैलेंडर, परदे जब झोंकों से हिलते हैं,
मन तृप्त होता और मैं भ्रह्मित होता हूँ।
मेरे पेट मैं जब चूहे-बिल्ली दौड़ते हैं,
मैं भी टकटकी लगाये, बाट जोहता हूँ,
मैं हिल सकता नहीं, सरक पाता नहीं,
कई बार अपने ही मलमूत्र में सोता हूँ,
पर इंतज़ार के जब कई बाँध टूटते हैं,
तब जाकर मैं बिलखते हुए रोता हूँ।
माँ, मैं तब जाकर बिलखते हुए रोता हूँ। ----- शशि
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