राहों से मिलते हैं
हम चढ़ते हैं, फिसलतें हैं,
गिरते और संभलतें हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
नए राहों से मिलते हैं |
कई बार, अक्सर,
उल्झन सा होता है |
मन मे संकोच और
विस्मय सा होता है |
तब एक कदम आगे,
उठाते हुए बढ़ते हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
नए राहों से मिलते हैं |
बाधाएँ जब आती है,
भयभीत कर जाती है |
पर जो अटल होता हैं,
तब आकर चले जाती है |
वह काठ के व्यक्ति हैं,
जो कठिनाई से डरतें हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
नए राहों से मिलते हैं |
---- शशि
नए राहों से मिलते हैं |
कई बार, अक्सर,
उल्झन सा होता है |
मन मे संकोच और
विस्मय सा होता है |
तब एक कदम आगे,
उठाते हुए बढ़ते हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
नए राहों से मिलते हैं |
बाधाएँ जब आती है,
भयभीत कर जाती है |
पर जो अटल होता हैं,
तब आकर चले जाती है |
वह काठ के व्यक्ति हैं,
जो कठिनाई से डरतें हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
नए राहों से मिलते हैं |
---- शशि
No comments:
Post a Comment