Sunday, December 23, 2012

ऑटो की सवारी


मुंबई शहर के कई है बिमारी,
उनमे से एक है ऑटो की सवारी ।
एक बार घर से निकलते,
पुछा हमने ऑटो से ।
"भाईसाहब, शहर के लिए,
क्या नाके तक चलोगे?"
ऑटो वाला मूंह बनाते हुए बोला,
"हाँ भई, पर कितने पैसे दोगे?"
सवाल मुझे चुभी जैसे हो सूई,
सोचा, ये क्या बात हुई!
फिर हमने भी आव देखा न ताव,
कहा, "तुम नहीं कह सकते हो भाव,
क्या तुम्हारा ख़राब है मीटर ?
वहां जाने के तेल लगते नहीं लीटर"
उसने हमारे मन को फिर से टटोला,
मन ही मन मुस्कुराते हुए बोला,
"हमारे साथ अगर नहीं आओगे,
राह ताकते हुए यूँही खड़े रह जाओगे,
तब कोई और ऑटो यहाँ आएगा,
तुम्हारी मजबूरी देख ज्यादा भाव बताएगा" ।
यह  सुन कर मेरा खून खौल गया,
(कुछ दिन पहले पढ़े),
इकोनॉमिक्स की भाषा बोल गया,
"यह कैसा मार्किट है,
क्या तुम्हे कंज्यूमर का नहीं है भय ?
भाव कितना हो, वही करता है तय,
यूनियन के बल पर हांकों न इतनी डिंग
कुछ भी कह लो पर कंज्यूमर इज किंग"
मेरी बातें सुन कर उससे रहा नहीं गया,
अर्थशास्त्र का ज्ञान उससे सहा नहीं गया ।
"तुम मुझे डिमांड और सप्लाई मत समझाओ,
यहाँ कर्व का उलटफेर है अब भी जाग जाओ,
यातायात की डिमांड को करते हैं हम पूरी,
दाम तो वह देगा ही, जाना है जिसे जरूरी" ।

                                   ---- शशि 

Monday, December 17, 2012

माँ, मैं महसूस करता हूँ

माँ, मैं जानता नहीं, समझता नहीं,
पर सब कुछ महसूस करता हूँ,
माँ, मैं  रोकता नहीं, टोकता नहीं,
पर सब कुछ कहना चाहता हूँ।
पंखे जब तेज़, गोल गोल घुमते हैं,
मन मचलता और मैं झूमता हूँ।
कैलेंडर, परदे जब झोंकों से हिलते हैं,
मन तृप्त होता और मैं भ्रह्मित होता हूँ।
मेरे पेट मैं जब चूहे-बिल्ली दौड़ते हैं,

मैं भी टकटकी लगाये, बाट जोहता हूँ,
मैं हिल सकता नहीं, सरक पाता नहीं,
कई बार अपने ही मलमूत्र में सोता हूँ,
पर  इंतज़ार के जब कई बाँध टूटते हैं,
तब जाकर मैं बिलखते हुए रोता हूँ।
माँ, मैं तब जाकर बिलखते हुए रोता हूँ।                                ----- शशि 

Sunday, December 16, 2012

राहों से मिलते हैं


राहों से मिलते हैं


हम चढ़ते हैं, फिसलतें हैं,
     गिरते  और संभलतें हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
     नए राहों से मिलते हैं |

कई बार, अक्सर,
     उल्झन सा होता है |
मन मे संकोच और
    विस्मय सा होता है |
तब एक कदम आगे,
    उठाते हुए बढ़ते हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
     नए राहों से मिलते हैं |

बाधाएँ जब आती है,
    भयभीत कर जाती है |
पर जो अटल होता हैं,
    तब आकर चले जाती है |
वह काठ के व्यक्ति हैं,
    जो कठिनाई से डरतें हैं |
हम राहों पर भटकते हुए,
     नए राहों से मिलते हैं |


             ---- शशि